रिपोर्टर दिपक डोडिया मो 9131749608
“पीला सोना” के किसानों के साथ छल — भावांतर योजना बनी सिरदर्द, विधायक भंवर सिंह शेखावत ने दी आंदोलन की चेतावनी |
पंजीयन की जटिल प्रक्रिया, सर्वर डाउन और तकनीकी स्टाफ की कमी से किसान परेशान — लागत मूल्य भी नहीं मिल रहा, सरकार पर छलावे का आरोप
मध्य प्रदेश में किसानों की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाली सोयाबीन फसल, जिसे किसान प्यार से “पीला सोना” कहते हैं, इस बार किसानों के लिए संकट का कारण बन गई है । सरकार द्वारा किसानों को राहत देने के उद्देश्य से शुरू की गई भावांतर भुगतान योजना किसानों के लिए मदद से ज्यादा परेशानी का सबब बन गई है।
किसानों का आरोप है कि सरकार भावांतर राशि का लालच देकर छलावा कर रही है। योजना का लाभ पाने के लिए किसानों को ऑनलाइन पंजीयन, दस्तावेज़ अपलोड और तकनीकी सत्यापन जैसी जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है, जो ग्रामीण क्षेत्रों के सामान्य कृषकों की पहुँच से बाहर है |
जिलेभर में स्थापित पंजीयन केंद्रों पर तकनीकी स्टाफ की कमी और सर्वर डाउन रहने की समस्या आम हो गई है । किसान कई-कई घंटे कतारों में लगकर भी अपना पंजीयन नहीं करा पा रहे हैं । गाँवों के अधिकांश किसानों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट या डिजिटल जानकारी का अभाव है, जिससे वे सरकारी पोर्टलों पर पंजीयन की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पा रहे । परिणामस्वरूप हजारों किसान योजना के लाभ से वंचित हो रहे हैं । किसानों ने यह भी कहा कि सरकारी सिस्टम में पारदर्शिता की कमी है और कई बार पोर्टल में जानकारी गलत दर्ज हो जाती है, जिसे सुधारने में हफ्तों लग जाते हैं।
विधायक श्री शेखावत ने सरकार की इस नीति को किसानों के साथ अन्याय बताया है। उन्होंने कहा की, “किसानों को उनकी मेहनत का लागत मूल्य तक नहीं मिल रहा । भावांतर के नाम पर सरकार किसानों को भ्रमित कर रही है । यह योजना केवल कागज़ों पर चल रही है, ज़मीन पर नहीं । यदि सरकार ने शीघ्र सुधार नहीं किए तो हमें किसानों के हित में उग्र आंदोलन करना पड़ेगा और सरकार को यह नीति बदलने के लिए विवश करना होगा।” उन्होंने कहा कि प्रदेश का किसान आज भी सबसे बड़ा करदाता और परिश्रमी वर्ग है, परंतु सरकारी नीतियाँ उसे राहत नहीं, बल्कि और अधिक कर्ज़ और चिंता की ओर धकेल रही हैं।
शेखावत ने कहा की, इस बार सोयाबीन की फसल पर उन्हें लागत मूल्य से भी कम दाम मिल रहे हैं । जहाँ उत्पादन लागत करीब ₹5,000 से 5,500 प्रति बीघा आ रहा है, वही ओसत उत्पादन 1.50 से 2.00 क्विंटल ओसत उत्पादन हो रहा है जो मंडियों में बिक्री मूल्य ₹3,500 से ₹3,800 तक ही है । इससे किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कई किसान अपनी उपज गोदामों में रोककर बैठे हैं, उम्मीद में कि शायद सरकार भावांतर राशि या समर्थन मूल्य में सुधार करेगी । भावांतर योजना का उद्देश्य किसानों को बाजार मूल्य में होने वाले अंतर की भरपाई करना था, लेकिन जटिल प्रक्रिया, तकनीकी खामियाँ और प्रशासनिक उदासीनता के कारण इसका लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुँच पा रहा है।
उन्होंने सरकार से मांग की है की, योजना को सरल बनाते हुए प्रत्यक्ष भुगतान प्रणाली (Direct Benefit Transfer) लागू की जाए ताकि राशि सीधे किसानों के खाते में पहुंच सके । भावांतर योजना, जो कभी किसानों की उम्मीद की किरण थी, अब निराशा और भ्रम का प्रतीक बन गई है। सरकार को चाहिए कि वह किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझे, पंजीयन प्रक्रिया को सरल बनाए और किसानों को फसल का उचित दाम दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए । विधायक शेखावत ने यह भी कहा की, किसानों की आवाज़ बनकर इस मुद्दे को सड़क से सदन तक उठाने की बात कर रहेंगे । यदि सरकार ने समय रहते नीति में सुधार नहीं किया, तो “पीला सोना” के इस प्रदेश में किसानों का आक्रोश आंदोलन का रूप ले सकता है — और यह सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि किसानों के भविष्य का सवाल बन जाएगा । उक्त जानकारी विधायक निज सहायक आर.पी .सिंह द्वारा दी गई |
आर.पी.सिंह
निज सहायक
माननीय विधायक बदनावर


